Saturday, April 5, 2008

कवि हृदय

भोर की सुनहरी रश्मियो की तरह
झांक चुपके से उतर आती है
कैसे शब्दों की लड़ीया
कवि की कविता बन जाती है
प्रश्न नहीं है महत्वपूर्ण
के बनती कविता कैसे
मनन तो है कि एक हृदय
कवि हृदय बन गया कैसे
क्या था वह इतना पुलकित
कि मन के मोती बिखरने लगे
या व्यथा के मंथन से ज्यों
अमृत बूँदें सी झरने लगे
कारण हो जो भी
यह जग जान कहाँ पाता है
शायद जग को जान जान कर
कोई कविता कर पाता है
उस को तो चाहिये बस एक कवि हृदय
अमर पंक्तियाँ रच जाने को
एक छोटा सा धूप का टुकड़ा भी
है काफी काव्यमय बन जाने को
क्षण मे अनंत कि थाह ले ले
शून्य मे जो सृष्टि कर जाता है
देख ले जो बूंद मे समंदर
वही तो कवि हृदय कहलाता है

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