भोर की सुनहरी रश्मियो की तरह
झांक चुपके से उतर आती है
कैसे शब्दों की लड़ीया
कवि की कविता बन जाती है
प्रश्न नहीं है महत्वपूर्ण
के बनती कविता कैसे
मनन तो है कि एक हृदय
कवि हृदय बन गया कैसे
क्या था वह इतना पुलकित
कि मन के मोती बिखरने लगे
या व्यथा के मंथन से ज्यों
अमृत बूँदें सी झरने लगे
कारण हो जो भी
यह जग जान कहाँ पाता है
शायद जग को जान जान कर
कोई कविता कर पाता है
उस को तो चाहिये बस एक कवि हृदय
अमर पंक्तियाँ रच जाने को
एक छोटा सा धूप का टुकड़ा भी
है काफी काव्यमय बन जाने को
क्षण मे अनंत कि थाह ले ले
शून्य मे जो सृष्टि कर जाता है
देख ले जो बूंद मे समंदर
वही तो कवि हृदय कहलाता है
Saturday, April 5, 2008
कवि हृदय
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment