Pinboliada
Saturday, April 4, 2009
Saturday, April 5, 2008
चाह
ये भी क्या एहसान कम है,
कि लब पे तेरे मेरा नाम आए
कह न सके हम ज़ुबा से जो,
खामोशी वही बात कह जाए
मांग बैठे हैं तुझको ख़ुदा से हम,
इसके बाद और क्या मांगा जाए
दिल को दिल की राह होती है,
काश तू भी तो ये समझ पाए
मैं जब भी देखूँ तुझे,
मेरा ही अक्स तुझमें नज़र आए
मैं तुझमें खो जाऊँ इस तरह,
कोई फासला दरम्यां न रह जाए
दर्द भी तेरा कुबूल है,
तू जो पल भर मेरा हो जाए
जी लेंगे उस एक पल को,
जिन्दगी से कोई शिकवा न रह जाए
इंतज़ार का लुत्फ़ कम नहीं,
लेकिन यही आदत न बन जाए
कोई तो लम्हा ऐसा आए,
कि तू आए और वक्त थम जाए
कवि हृदय
भोर की सुनहरी रश्मियो की तरह
झांक चुपके से उतर आती है
कैसे शब्दों की लड़ीया
कवि की कविता बन जाती है
प्रश्न नहीं है महत्वपूर्ण
के बनती कविता कैसे
मनन तो है कि एक हृदय
कवि हृदय बन गया कैसे
क्या था वह इतना पुलकित
कि मन के मोती बिखरने लगे
या व्यथा के मंथन से ज्यों
अमृत बूँदें सी झरने लगे
कारण हो जो भी
यह जग जान कहाँ पाता है
शायद जग को जान जान कर
कोई कविता कर पाता है
उस को तो चाहिये बस एक कवि हृदय
अमर पंक्तियाँ रच जाने को
एक छोटा सा धूप का टुकड़ा भी
है काफी काव्यमय बन जाने को
क्षण मे अनंत कि थाह ले ले
शून्य मे जो सृष्टि कर जाता है
देख ले जो बूंद मे समंदर
वही तो कवि हृदय कहलाता है